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Mr. Zuber Ahmed Khan is a Muslim by birth, has got strong and stiff views on Islam. Mr. Zuber believes in Humanity when Islam is in trouble. He believes any Muslim Men or Women should die for Islam when required. Mr. Zuber Ahmed Khan completed his Post Graduate in Public Administration in the year 1995 and stands in first class. He completed his Diploma in Computer Hardware and Software Engineering from Bombay. Completed Masters Degree in Journalism & Mass Communication and stand in first Class.

Friday, 12 May 2017

जिहाद का इस्लमिक फलसफा

इजराइल का यहूदी आतकवाद और भारत का संघी आतकवाद अगर घबराते हे तो इस्लामिक जिहाद के फलसवे से भोहोत घबराते हे. यहूदिओं की तरह भारत के संघी भी मुस्लिम वर्ग पे ज़ुल्म करने में कभी भी पीछे नहीं रहते। २०१४ के बाद भारत में जब से संघी हूकूमत का आगाज़ हुआ हे भारत के इतिहास में नया अध्याय लिखने की कवायत शुरू हो गई हे. 


जिहाद इस्लाम के लिए एक पाकीज़ा लड़ाई हे जो सिर्फ और सिर्फ ज़ालिमों के खिलाफ अल्लाह और उसके रसूल के बताये तरीके पे मज़लूमो की तरफ से ज़ुल्म और ज़ालिम का खात्मा करने के लिए लड़ी जाती हे. इस लड़ाई का ताल्लुक सिर्फ इस्लाम और इंसानियत को बचने के लिए होना चाहिए अगर ये लड़ाई निजी या किसी दुश्मनी की वजह से हे तो वो जिहाद नहीं. 

जिहाद इस्लाम का छटा फ़र्ज़ हे. लेकिन य फ़र्ज़ मुसलमानो पे हर वक्त लाज़िम नहीं होता हे. जैसे ये तीन एहकान लाज़िम और ज़रूरी हे हर एक मुलसमान पे 

१. कलमा - इ - तय्यबा 
२. नमाज़  
३. रोज़ा।  

य ३ एहकान हर मुसलमान पे लाज़िम और ज़रूरी हे. 

४. हज 
५. ज़कात 

४ और ५ ये दोनों एहकान सिर्फ उन्ही मुसलमानो पे लाज़िम होते हे जो साहेबे निसाब हो. हज के लिए ये शर्त ज़रूरी हे एक मुसलमान के पास इतनी दौलत हो के वो अपने सारे फाराइज़ और ज़िम्मेदारी से सुबुकदोष होने के बाद उसके पास इतना माल बचे की आने जाने के और दीगर इख़राजात पूरा कर सके तो उसके ऊपर हज लाज़िम हे अगर फिर भी एक मुलसमान हज नहीं करता हे तो वो गुनहगार हे. ज़कात भी साहेबे निसाब के ऊपर फर्ज की गई हे जिस मुसलमान के पास साढ़े बावन तौला चांदी या साडे सात तौला सोना या उतनी रकम हो और उसपे एक साल गुज़र जाय तो हर सेकडे पे ढाई फीसद ज़कात फ़र्ज़ हे, जो गरीबो का हक़ हे और गरीबो के देना फ़र्ज़ हे.  


तो जिस तरह से हज और ज़कात हर मुलसमान पे फ़र्ज़ नहीं हे उसी तरह इस्लाम का छटा एहकान जिहाद परिकूल परिस्थिति में खामोश और शांत रेहता है.  और विपरीत परिस्तिथि में मुसलमानो पे लाज़िम और फ़र्ज़ होता हे.  अगर जिहाद का फ़तवा जारी होता है, तो किसी भी  बालिग मुलसमान मर्द को घर पे रेहना हराम होगा.  सिर्फ घरो पे बूड़े मर्द, नाबालिग बच्चे, औरते ओर बीमार रेह सकते है.  सिर्फ एक मर्द जो ओरतो ओर दूसरे घर वालो की हिफाज़त कर सके रुक सकता है. जिहाद के कुछ फ़राइज़ भी हे वो ये की जिहाद सिर्फ अल्लाह और उसके रसूल की ख़ुशनूदी के लिए इस्लाम और इंसानियत को बचने के लिए लड़ा जाय न की किसी भी इंसान को निजी फायदा पहुँचाने की निस्बत से लड़ा जाय. पैगबरे इस्लाम के दौर में जब जिहाद किया जाता था तो जिहादीओ को पैगबरे इस्लाम की य सख्त हिदायते थी. 

१.  दौराने जंग पेड़ मत काटना और अपने घोड़ो की टापों से खड़ी फसल बर्बाद मत करना।
२.  दौराने जंग दुश्मन के मासूम बच्चो, बूड़ो, औरतो और बीमारों को मत क़त्ल करना. 
३.  दौराने जंग दुश्मन की इबादत गाहो को मत नुकसान पहुँचना बल्कि उनको 
    मेहफ़ूज़ करना.  
४.  रिहाइशी मकानों के ऊपर हमला मत करना और उनको मत गिराना. 
५.  जान बचा के भागते हुए दुश्मन को मत क़त्ल करना. 
६.  दुश्मन के सिपाही ने अगर हथियार डाल दिया और हार क़ुबूल कर ली तो मत 
    क़त्ल करना. 
७.  दुश्मन के आलिमो को मत क़त्ल करना। 
८.  दुश्मन के फ़ौजिओं की लाशो की बेहुरमती मत करना. 
९.  जानवरो को मत क़त्ल करना. 
१०. कैद किये हुए दुश्मन के फ़ौजिओं से अच्छा सुलूक करना. 
११. ज़बरदस्ती इस्लाम कुबूल मत करवाना. 

जो भी सच्चा जिहादी हे और अल्लाह और उसके रसूल के लिए जिहाद कर रहा हे जिसे 'जिहाद फि सबिलीला' कहते हे वो हर दम पैगबर के बताय हुए रस्ते पे अमल करेगा.  आज कल जो कुछ भी जिहाद के नाम पे गलतिया हो रही हे वो असल में ये यहूदी आतकवादी और  संघी आतकवादी कर रहे हे सिर्फ और सिर्फ इस्लाम और जिहादीओ को बदनाम करने के लिए.  जिहाद की किस्मे.

१.  जिहाद बिस सेफ:  ये जिहाद की सबसे बेहतर और अच्छी किस्म हे, अगर आपमें हिम्मत, वुसत और कूव्वत हे तो जिहादी फिल्ड पे जा के जंग के मैदान में दुश्मन को ललकारता हे और बुराई से अच्छाई की तरफ आने की दावत देता हे अगर दुश्मन उसकी बात नहीं सुनता तो जिहादी उससे दो हाथ करता हे.

२.  जिहाद बिल कलम:  इस तरह के जिहाद में कलम के ज़रिये दुश्मन को शाकिस्त दी जाती  हे, दुश्मन की हर   बात का तहरीरी माकूल जवाब दिया जाता हे और उसको इंसानियत के ऊपर ज़ुल्म करने से और हर बूरा काम करने से रोका जाता हे.

३.  जिहाद बिल  लिसान: इस तरह की जिहाद में ज़ुबानी जग होती हे. जिसमे दुश्मन के हर सवाल का माकूल जवाब दिया जाता हे. और उसको ज़ुबान से बुराई और इंसानियत पे ज़ुल्म करने से रोका जाता हे.

४. जिहाद बिल क़ल्ब :  इस तरह के जिहाद में जिहादी अपनी नफ़्सानी ख्वाहिशात को काबू में करता हे और अपने आपको हर एंटी इस्लामिक काम से रोकता हे और दुश्मन के हर बुरे काम को दिल में बूरा जनता हे.


भारत में आज का दौर देखते हुए चौतरफा जिहाद की आवाज़े उठने लगी हे.  अगर भारत में जिहाद होगा तो वो जिहाद बिल्कुल इस्लामिक होगा जैसा की उमर फ़ारूक़ रेज़ अलाहा ने इस्राएल में बैतूल मुकद्द्स को फतह किया था. और बगैर जंग लडे और खून गारत करे सिर्फ सहाबा का किरदार और इस्लामिक कल्चर देख के ही यहूदिओं ने बैतूल मुकद्द्स और शहर की चाबियां दे दी थी. क्यूकी यहूदिओं के नूजूमीयो ने पेशनगोई की थी के अगर ऐसा बादशाह आय जो घोड़े की नकेल पकड़ा हो और गुलाम घोड़े पे सवार हो तो उससे हरगिज़ जंग मत करना तुम जीत ही नहीं पाओगे बल्कि तुम्हारी शाकिस्त होगी।  


किसी भी हुकूमत या ज़ालिम बादशाह से जिहाद का हूकूम देने से पहले उस संघी हूकूमत को तीन तहरीरी वार्निग देना ज़रूरी होगा जो इस्लामिक जिहाद का पहला फ़र्ज़ हे.  जिससे बादशाह को अपनी गलती का एहसास हो और उसको सुधारने का मौका दिया जाय. पहली वार्निग अगर नहीं सूनी जाती तो थोड़े वक़्त के बाद दूसरी तहरीर दी जाय फिर तीसरी ओर आखरी वार्निंग मे कहा जयेगा आपने हमारी इन शर्तो को नही माना है ओर अब हमारी तरफ़ से एलाने जग है.  या तो आप हम से जग करिये या एंटी इस्लमामिक एक्ट बंद करिये. 


जुबेर अहमद खान


Please catch English version of my article in the next edition. 
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