Wednesday, 20 February 2019

बस बस टूट गया

"नाव कागज़ की सदा चलती नहीं, ज़ुल्म की टहनी कभी फलती नहीं"
पका हुआ एक नासूर हुआ अलग, मज़ीद दो नासूर परेशान करने को तय्यार

नाज़रीन आज का मज़मून सहाफी का सख्त तनक़ीद से भरा और मज़म्मत वाला है.  आज का मज़मून दो हिस्सों पे मुश्तमिल है:-

१.     वाजपाई की बीजेपी जमुहरियाती हुकूमत बामुक़ाबिल मोदी की हूकूमशाही हुकूमत
२.     मुस्लिम मौलानाओं का पुलवामा पे एहतेजाज  

पहले हिस्से में हम तब्सिरा करेंगे वाजपाई की बीजपी हुकूमत की जो जमुहरियाती मालियात पे यकीन रखती थी.  कानून साज़ों की आवाज़ की इज़्ज़त रखती थी. अवाम के हर तबके के लिए आज़ादाना माहौल फ़राहम था.  क्योंकि वाजपाई एक तालीमी आफ़ता, दानिशमंद खुली सोच रखने वाले वज़ीरे आज़म थे जो एक मुसन्निफ़ और शायर भी थे तो उनकी सोच में भी इंसानी हुकूक के तहफूज़ का जज़्बा था.  दानिशमंदी थी सूझ बूझ थी, मसले की नज़ाकत को समझते थे, किसी भी काम को करने के लिए शिद्दतपसंदी, जब्र का सहारा नहीं लेते थे जो जमुहरियत के लिए ज़हर है, हूकूमशाही या तानाशाही हुकूमत  में ठीक है.   वही दूसरी तरफ मौजूदा दौर के नए भारत के वज़ीरे अज़ाम एक ऐसी शख्सियत हैं जिनकी सोच अमल में जब्र, तशद्दुत, हूकूमशाही, तानाशाही नुमाया है.  जिनको खून खराबा, मार काट, दहशतगर्दी खूब पसंद है जिसकी जीती जागती मिसाल है गुजरात २००२ दहशतगर्दाना हमले जिसमे मुसलमानों की नस्ल कुशी की गई, हज़ारों को हलाक किया गया और लाखो बे घर हो गए.   नए दौर के इस वज़ीरे आज़म की तालीम भी काफी शक और शुकूक के घेरे में है.  दानिशमंदी और सूझ बूझ तो आज के भारत में बढ़ते हुए आलूद, मवाद और ज़हर से ही साबित हो जाती है की उनकी क्या ज़ेहनियत होगी.  फिर नए भारत में अदलिया, इंतेज़ामिया, आर्मी और तहक़ीक़ाति इदारे (सी.बी.आई, एन.आई.ऐ.) वगेरा और सहाफत सब उनके हुकुम के गुलाम हैं.

जिस किसी ने उनकी हुकुम अदूली की उसके ऊपर इंतेज़ामिया का खौफ और दहशत तारी कर दी जाती है.  जो फिर भी निडर और बे खौफ इन्साफ की आवाज़ के परचम को बुलंद करता रहा और अलम्बरदार हुआ उसको मौत की आगोश में सुला दिया जाता है.  चाहे वो अदलिया (सुप्रीम कोर्ट) का आला दर्जा हो या सहाफत, या फिर मुख़लिफ़ीनों का वो तपका हो जो बोहोत ही सवाल जवाब तलब करता है.

हाल ही में हुए पुलवामा हादसे में इस सहाफी की टीम को आला दर्जे की नाहीली और गफलत की जानकारी मिली है.  ये हादसा टाला जा सकता था लेकिन अपने सियासी नफे और गफलत की वजह से उसको मज़ीद पेचीदा बनाया गया, अब मसले की बारीकी और नज़ाकत को समझते हुए आंसू बहाने, एक्शन लेने का ठोंग किया जा रहा है.  लेकिन ये सहाफी यकीन के साथ कह सकता है की असली मुजरिम चाहे ज़मीन के सबसे निचले हिस्से में भी छुप जाए या आसमान की  बुलंदियों पे पहुंच जाए बच नहीं सकता.   बोहोत बड़ी गलती कर दी मुजरिम ने इसका उसको इन्दाज़ा नहीं है, के वो क्या कर बैठा, इस बात का इन्दाज़ा उसको बाद में होगा.  उसने जो करना था कर दिया अब वो आएगा सख्त सवाल जवाब के घेरे में.

मज़मून का दूसरा हिस्सा मुस्लिम मौलानाओं की उस जमात पे मुश्तमिल है जो अपने अकीदतमंदों मशायक़ीनों और दिगर मुस्लिम अवाम के साथ इहतजाजी मुहीम का हिस्सा बन रहे हैं.  और पकिस्तान के खिलाफ अश्तेआल अंगेज़ी कर रहे है अज़हर मसूद को फ़ासी दो, पकिस्तान को तबाह कर दो जैसे नारे लगा रहे हैं.  ये सहाफी एक दम कुंद हो गया है और समझने से क़ासिर है की इस तरह की मोहीम कर के वो क्या साबित करना चाहतें हैं.  और उनका हुकूमत से मुतालबा क्या है.  अगर वो जंग चाहते हैं और पकिस्तान को तबाह करना चाहतें हैं, तो कुरान और हदीस की सख्त खिलाफ वर्ज़ी कर रहें हैं. क्योंकि अगर पकिस्तान को तबाह किया उसमे बे गुनाह मुस्लिम भी मारे जायेगे. और क़ुरान क्या कहता है हदीस का मफूम क्या है इन मौलानाओं को बेहतर समझ में आना चाहिए.   दूसरी बात इन लोगों का दोहरा रवय्या साफ़ दिख के आ रहा है.  ज़ुबान पे कुछ और है दिल में कुछ और.  

ठीक है दिल में तशवीश है तकलीफ है तो क्या ऐसे एहतेजाजी मुज़ाहिरों से दिल की जलन कम होगी. फिर अगर ऐसे इहतजाजी मुज़ाहिरों से मरहूमीनों की रूहों को सुकून पहुँचाना मकसद है तो उनके लिए इसाले सवाब काहे को नहीं करते.  क्या इन मौलानाओं में इतनी कूव्वत और हिम्मत है की सभी ४५ मरहूमीनों के लिए क़ुरान खानी का एहतेमाम कर सकें, उनकी गैबी नमाज़े जनाज़ा अदा कर सकें, सभी ४५ मौतों पे बगैर अगर मगर और किसी भी तफ़रीक़ के जन्नतुल फिरदोस और मग़फ़ेरत की दुआ कर सकें.  और उनको रौज़ाए महशर में आक़ा ए इनामदार के हाथों से जामे कोसर नसीब हो ऐसी दुआ कर सकें.   अगर ऐसा कुछ भी नहीं कर सकते तो ए दिखावा काहे को.  ए सहाफी दुआ गो है अपने लिए भी और दीगर मुस्लिम अवाम के लिए भी "या अल्लाह मेरा और सभी अकीदतमंदो का ज़ाहिर और बातिन एक कर दे.  या बातिन से ज़्यादा अच्छा ज़ाहिर कर दे."

असल बात तो ये है मौलाना इस हादसे के बाद ख़ौफ़ज़दा हो गए, और इंतेज़ामिया के सख्त दबाव में आ गए.  वही बात ये सहाफी अपने सभी मज़मूनों में लिखता आया है.  खौफ और तशद्दुत की सियासत करना छोड़ो और किसी भी मसले पे सियासी नफा लेने की कोशिश मत करो. ऐसे ही हालात २००२ में पैदा कर दिए थे, खौफ का वो अलाम था की कई मौलानाओं ने अपनी दाढ़ी मुड़वा ली थी.  हक़ बयानी की किसी ने भी बात कही की फ़ौरन अंदर डाल दिया जाता था.   हक़ बयानी की बात करने वाले सहाफिओं को गुजरात में दाखिल नहीं होने दिया जाता था बिल फ़र्ज़ कोई दाखिल हो गया तो उसका कैमरा तोड़ दिया जाता था और उसको मारा पीटा जाता था. उस दौरान हक़गोई करने वाले कई  सहाफी हलाक कर दिए गए थे. और वही हालात आज नए दौर के भारत के हैं.

किसी भी सियासी जमात की ऐसे बयानात पे मजबूरी समझ में आती है लेकिन मज़हबी रहनुमाओं का ऐसा अमल इस सहाफी के समझ से परे है जिसमे इस सहाफी को इनके ऊपर सिर्फ और सिर्फ हुकूमत का बे पनाह दबाव, शिद्दत और दहशत दिखती है.   क्योंकि कोई भी मुसलमान अपने दुसरे मुस्लिम भाई के लिए बदगुमानी हरगिज़ नहीं रखेगा और ना ही उसको किसी तीसरे से क़त्ल करने की साजिश का हिस्सा बनेगा.  फिर ये लोग तो मज़हबी रहनुमा हैं इन लोगो से ऐसी तवक़्क़ो ये सहाफी नहीं कर सकता था.   फिर इनका अमल क़ुरान और हदीस से एक दम उल्टा है.

खैर इस सहाफी को अपने अमल पे नाज़ है के वो इन्तेज़ामियाँ की किसी भी ऐसी शिद्दत और दबाव का हिस्सा और मोहरा नहीं बना और जो सब ने किया वो इस ने हरगिज़ नहीं किया.  अब इन सब लोगों की जमात से ये सहाफी एक दम अलग दिख रहा है, और इसने इन लोगो की शबाहत नहीं इख़्तेयार की.  हाँ इसने अपने पास मौजूद ज़ारायों का फायदा उठाया और तफ्तीश, जांच तहक़ीक़ात की और सही नताइज पे पंहुचा. 

अगरचे इसका दिल दुखा भी तो वो दिखाने की ज़रुरत नहीं है.  एहतेजाज करने या मोर्चा निकालने के पीछे एक मक़सद या मुतालबा होता है इन मौलानाओं का हूकूमते हिन्द से क्या मुतालबा है.  अगर इस एहतेजाजी मोहीम में इनका मक़सद दिखावा करना था तो गलत है इन लोगो को भी बीजेपी और संघी जैसा दिल में दर्द नहीं है बल्कि ये घड़याली आंसू सिर्फ और सिर्फ कोई ना कोई फायदे के लिए बहाये जा रहे हैं.  और अगर पाकिस्तान पे हमला करने की इनकी मंशा थी तो ये लोग क़ुरान और हदीस की खुली खिलाफ वर्ज़ी कर रहे हैं एक दारुल हर्ब से दारुल अमन के ऊपर हमले की साजिश का हिस्सा बन रहे हैं.  और अगर कुछ भी इनका मकसद नहीं था तो जो दिल में था वही ज़ुबान पे होना चाहिए. 

आज दीगर अवाम जंग की बात करता है क्योंकि उसका दिल दुखा है.  संघी, बीजेपी और शिद्दतपसन्द हिन्दू उसको हवा देतें हैं क्योंकि वो उस माहौल में अपना सियासी नफा देख रहे हैं.  लेकिन अमन पसंद और मुस्लिम अवाम क्या सोचता है क्या चाहता है इसकी कोई सहाफी रिपोर्टिंग करे की उनको इस मसले पे क्या जंग होना चाहिए या बात चीत के ज़रिये मसले का हल होना चाहिए इसकी खबरदारी करे.

फ़ौजिओं की शहादत पे मातम करना आंसू बहाना एहतेजाज करना मोर्चा निकालना सब ढोंग और दिखावा है.  किसी भी दानिशमंद या अवामी शख्सियात का ऐसा करने के पीछे कुछ न कुछ मकसद और पोशीदा अजेंडा होता है.  सियासी जमातों का मकसद अपना वोट बैंक मुस्तहकम करना होता है. मज़हबी रहनुमाओं के ऊपर सियासी और इंतेज़ामिया दबाव होता है.  लेकिन इस गहमा गहमी में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो शहीदों के विरसा से सच्ची हमदर्दी रखतें हैं और पोशीदा तरीके से बगैर किसी ताम झाम मीडिया कवरेज के मदद कर देतें हैं और सख्त अलफ़ाज़ में हिदायत देतें हैं की हमारी इमदाद या मदद को पोशीदा ही रहने देना और जग ज़ाहिर ना करना, वो होते हैं सच्चे हमदर्द.  मीडिया के सामने आके दिखावा कर के कुछ भी काम किया तो उसके पीछे की नियत और सूरत दोनों दिखाई दे रही हैं.  और किसी भी काम को करने की नियत को अल्लाह और वो बंदा खूब जानता है.  

Tuesday, 19 February 2019

ऐसे ही दफ़न होते हैं अवाम से जुड़े हुए मुद्दे.

नाज़रीन देखा आपने, कैसे इंतेखाबात से क़ब्ल अवाम के ज़हन को किसी दूसरी ही तरफ घूमा दिया.  इस ही को कहते हैं सियासत दान जो ना सिर्फ वतन के अवाम की लाशों पे बल्कि आर्मी जवानों की लाशों पे भी सियासत करता है.  २०१८ में कुछ एक मज़मूनों और "आज तक" की डिबेट में इस सहाफी ने साफ़ अलफ़ाज़ में बोला था जब मोदी जी बोहोत ही फेकम बाज़ी कर रहे थे.  अब फेकने का वक़्त गया अब हिसाब किताब का वक़्त है.  अवाम आपसे आपके किये हुए कामों का हिसाब लेगी. 

२०१८ के इख़्तेदाम यानी दिसम्बर के महीने से ले कर मई २०१९ तक ५ महीने इस सहाफी ने मोदी जी के हिसाब किताब के लिए रखे थे.  और अवाम को खुली छूट दी थी के मोदी के ऊपर सवालों के हमले का वक़्त और जगह  खुद ते करेगें.  उसके लिए उनको किसी की भी इजाजात की ज़रुरत नहीं है.  क्योंकि अगर ४.५ साल में अवाम के लिए कुछ भी भलाई के काम किये होते तो अपनी सरकार के किये हुए अच्छे कामों का बयान करने के लिए ५ महीने भी थोड़े होतें हैं.   हालांकि मोदी और बीजेपी को इस बात का इल्म हो गया था की उनके लिए २०१९ में राहें अब पहले जैसी साज़गार नहीं रही.  हर मुद्दे पे मोदी हुकूमत फ़ैल रही जिसकी वजह से अवाम में ज़बरदस्त मुखालीफे रुझानात हैं.  ये कारगरदेगी मोदी हुकूमत की सिर्फ ५ साल की सरकार की थी. अब उनको लगने लगा था हमारा इस पार्लियामेंट से रुखसत होना ते है क्योंकि जो भी दूसरी सरकार आएगी अवाम पे किये हुए एक एक ज़ुल्म और आंसूं का हिसाब मांगेगी. 

बीजेपी के सियासतदान मंत्री संत्री कहतें हैं की पुलवामा पे हमको भी बोहोत तशवीश है और हम उसका सियासी नफा नहीं लेना चाहते तो हर मीडिया चैनल में पुलवामा की ही बातें काहे को हो रही हैं.  एक तरफ अवाम को मिडिया के द्वारा पुलवामा के नाम पे मज़ीद गुबार भर के गुमराह जा रहा है दूसरी तरफ बीजेपी अपनी सियासी कारगरदेगी पूरी तरह से निभा रही है.  कल महाराष्ट्र में शिव सेना के साथ इत्तेहाद कर लिया और आज तमिलनाडु में ऐ.आई.डी.ऍम.के से इत्तेहाद कर लिया.  अब महाराष्ट्र में २५ सीटों पे बीजेपी और २३ पे शिव सेना और तमिल नाडु में बीजेपी को ५ सीटें लड़ने को मिल रही हैं.  सबसे बड़ी बात जो बीजेपी का किरदार रहा है गले लग के पीठ पे खंजर खोप देना वही हाल इस हमले के बाद अवाम को गले लगा के ख़ामोशी से क़त्ल कर डाला.  जब वतन का अवाम अपने गम में डूबा था तब बीजेपी ने उन तमाम मसाईल पे कफ़न डाल दिया जो उसके लिए इंतेखाबात में मुज़िर साबित हो सकते थे.  बीजेपी पार्लियामेंट में भी ऐसी ही कारगरदेगी के लिए मशहूर है.  जो कोई बिल उसके मुवाफ़ेक़त का होता है जिसका के उसको सियासी नफा होने वाला होता है कानून साज़ों को भी ऐसे ही गुमराह कर के बिल पास करवा लिया जाता है. 

जो सवालात की फेहरिस्त बीजेपी के लिए मुज़िर साबित होती जा रही थी अवाम के जो सवाल बीजेपी के मंत्रिओं के सामने एक पहाड़ के मानिंद खड़े थे उन सवालात पे अब तब्सिरा और गुफ्तगू काहे को नहीं हो रहा है.  फिर मीडिया भी संघी आतंकवाद ज़ेहनियत के बूढ़े रिटायर्ड ज़हरीली ज़ेहनियत आर्मी के लोगों को बुला रही है जो अवाम के दिलो दिमाग में मज़ीद आलूद और मवाद कायम रख सकें और इंतेखाबात तक ये आलूद ज़िंदा रहे ताके उसका फायदा बीजेपी को मिल जाए.  

जिस तरह से बूढ़े संघी दहशतगर्दाना ज़हरीले, मवादी आर्मी अफसर पाकिस्तान पे हमला करने और पुरानी जंगों की याद दिहानी कर के अपना ५६ इंची सीना चौड़ा कर रहे हैं उससे सिर्फ और सिर्फ अवाम के दिल में बीजेपी की लिए ये संघी दहशतगर्दाना ज़हरीले, मवादी आर्मी अफसर उनसियत भर रहें हैं उनका और मीडया का मकसद भी वही है जिसके लिए बुढ़ापे में इन आर्मी ऑफिसर्स और मिडिया को बीजेपी और सरकार से पैसा मिलता है.  वतन के नाम पे फ्री फुग्गे का बीजेपी के लिए इश्तेहार.  कोई भी दानिशमंद और अक़लमंद, पढ़ा लिखा इंसान समझ सकता है की जितनी आसानी से जंग की बातें कही जा रही हैं वो उतनी आसान नहीं हैं.   जब किसी भी मुल्क से जंग के हालात होते हैं तो सबसे पहले दोनों तरफ के सिफारातखानें बंद होते हैं.  फिर अक़वामे मुत्तहेदा में इस तरह की एक सिफारिश की जाती है की इस मुद्दे पे हम जंग लड़ रहे हैं.  दोनों तरफ से किसी भी तरह का मज़ाकिरात नहीं होता.  तिजारत, कारोबार और ज़राये आमद रफ़्त पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है.  दोनों तरफ की हवाएं और पानी क़ैद हो जाते हैं.  अब अगर पाकिस्तान की हवा में ना सिर्फ जंगी बल्कि अवामी तय्यारा घुसा के फ़ौरन उसको मार गिराया जाएगा और वैसा ही भारत की तरफ से होगा.   वही हालात पानी के होंगे, पाकिस्तानी दरिया में कोई भी कश्ती घुसी तो उसको पकड़ा नहीं जाएगा बल्कि फ़ौरन शूट कर दिया जाएगा और वैसा ही भारत की तरफ से होगा.  

फिर सरकार की तरफ से एलान किया जाता है दुसरे मुल्क को एक मुक़र्ररा वक़त पे हमारी ये मांग पूरी करो नहीं तो जंग के लिए तैयार रहो.  फिर हमला होता है.  लेकिन ऐसा तो कुछ भी नहीं है. ज़राये आमद रफ़्त पूरी तरह से चालू है, तिजारत चालू है, मुज़किरात चालू है वहाँ की खबरे यहाँ मालूम पड़ रही हैं और यहाँ की खबरे वहाँ.   तो मोदी सरकार बीजेपी वाले और लंगूर मीडिया ज़हरीले बूढ़ों की कयादत कर के किस को बेवकूफ बना रहे हैं.  जंग इतना आसान नहीं है उसके लिए अभी तक ना तो मोदी ने और ना ही इमरान खान ने वैसे हालात दिखाए हैं.  ये सिर्फ ज़ुबानी जमा खर्च इंतेखाबात तक रहेगी.  और इन आर्मी के बूढ़ों की ज़ुबानी जमा खर्च है और कुछ नहीं.      

दूसरी बात अगर जंग लड़ना सरकार का मकसद होता तो इंतेखाबात की तैयारी ना की जाती.  शिव सेना से और तमिल नाडु में इत्तेहाद करना ही इस बात की दलील है की हुकूमत को जंग नहीं लड़ना है, क्योंकि अगर जंग लड़ना मकसद होता तो काहे का इत्तेहाद और काहे का इंतेखाबात फिर उस तरह से मामले की नज़ाकत समझमे आती.  फिर जंग लड़ने के लिए पार्लियामेंट से इजाज़त ज़रूरी होती है,  और अब तो कोई पार्लिअमानी इजलास नहीं होने वाला है और अब तो ख़ास इजलास की भी कोई नौइय्यत समझ में नहीं आती तो किस को ये संघी और बीजेपी वाले बेवकूफ बना रहे हैं. 

अभी तक ना ही भारत ने और ना ही पाकिस्तान ने सरहद पे टैंक, तोप और अपनी अपनी आर्मी की अक्सरियत को बढ़ाया है और ना ही दोनों मुल्कों के सरहदी बाशिंदों को मेहफ़ूज़ जगह ले जाय गया है.  तो अभी तक जंग के हालात इस सहाफी को नज़र नहीं आते.  हाँ लंगूर और लँगूरनियाँ बूढ़े ज़हरीली ज़ेहनियत के साथ अवाम के अंदर हम जंग लड़ेगें  के शक और उलझन को कायम रखेगें.    

जंग की गाजर सिर्फ और सिर्फ इन्तेख़ाबात तक लटकी रहेगी और इस लटकती हुई गाजर के पीछे बीजेपी अपना इन्तेख़ाबी नफ़ा देख रही है, और उसकी कारगरदेगी पूरा करने की कोशिश कर रही है.  अब ना कोई मुखालिफ सवाल कर रहा है और ना ही कोई जिन्न परेशान कर रहा है और मीडिया की लँगूरनियाँ रस्ते की गर्द, गुबार नीचे की घांस बूढ़े ज़हरीले आलूद मवादी मर्मी अफसरों से साफ़ करवाते चल रहीं हैं ताके इन्तेख़ाबात तक बीजेपी को मिले साफ़ सुथरा एहसास, और उनके लिए अपनी ख्वाबगाह (पार्लियामेंट) में जाने से पहले सेज सजी हुई मिले.

Sunday, 17 February 2019

लाशों पे सियासत

नाज़रीन मेरे हमख्याल सहाफिओं और हमक़दम साथिओं,

लाशों पे सियासत करना कोई भी बाविकाकर और बा इज़्ज़त शहरी नहीं चाहेगा.  अब जिसका विकार और हिस अपने अना को क़याम रखने के लिए होगा, वो मुल्क के अवाम को क्या फ़ौजिओं की लाशों पे भी सियासत करने से बाज़ नहीं रहते.    हालात की पेचीदगी और संजीदगी का इल्म इस सहाफी को पहले ही हो चूका था, जिसको एहले ज़ौक़ या एहले तरीक़त हज़रात इहलाम, मेडिकल साइंस में ६टा एहसास या ६टी इंद्री कहते हैं.  लेकिन संघी दहशतगर्द उसको मुलव्विस होना कह रहे हैं, जो सरा सर गलतबयानी है. 
  
ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट की टीम अभी तक ये मान के चल रही है और जो मालूमात इकट्ठा की है उससे ये ज़ाहिर हो रहा है की पुलवामा में जो कुछ भी हुआ ये एक हादसा था.  बिल फ़र्ज़ अगर ये दहशगर्दाना हमला था तो उसकी ज़िम्मेदारी भी पूरी तरह से हुकूमते हिन्द के ऊपर आएद होती है.  क्योंकि इस सहाफी का कोई भी मजमून इसीलिए ही होता है के उसको पड़ कर हुकूमत अपना निज़ाम सही और दुरुस्त कर लें. कांग्रेस के सरबराह ने और कांग्रेसी सयासतदांओं ने इस सहाफी के मज़मूनों को पड़ के अपने आपको दुरुस्त किया जिसका फायदा उनको वक़्त वक़्त पे मिला.  लेकिन अब जिसके दिलों दिमाग में आलूद और ज़हर भरा हो, जिसको सियासत में अपने कानून साज़ों की कुव्वत पे फख्र हो जो ताक़त के नशे में चूर हो  जो इस सहाफी की दी हुई जानकारी की धज्जिया उड़ा दे और उसका मखौल उड़ाए तो ये उसकी नाहीली और निकम्मा पन ही कहलाया जाएगा.  फिर ज़िम्मेदारी किसी और के ऊपर थोपने से अच्छा है की मर्कज़ खुद इस हमले की अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी लें और अपने आपको मुल्क की जिम्मेदारिओं से आज़ाद करे.

पुलवामा में जो कुछ भी हुआ उसका ठीकरा नए दौर के भारत के वज़ीरे अज़ाम पडोसी मुल्क पाकिस्तान पे थोप कर रहें हैं.  ठीक है पाकिस्तान ज़िम्मेदार है लेकिन फ़ौजिओं के तहफूज़ की ज़िम्मेदारी थोड़ी पकिस्तान के ऊपर है.  एक तरफ तो आप उसको अपना दुश्मन मान रहे हो दूसरी तरफ सैनिकों के तहफूज़ का एक़दाम बराबर नहीं कर रहे हो तो दुश्मन का काम है ज़र्ब पहुँचाना आप उस ज़र्ब का शिकार हुए मतलब नाहीली आपकी है.  सबसे बड़ी बात अगर ये दहशतगर्द हमला है तो इतनी बड़ी तादात में विस्फोटक आया कैसे.  दूसरी बात अफ़ज़ल गुरु की बरसी के दिन से एक हफ्ता पहले से ही सिक्योरिटी अलर्ट जारी किया हुआ था फिर कैसे १५० से लेकर २५० किलो विस्फोटक वाली कार फौजी कानवा में घूस गई, उस कार को रास्ते में किसी ने काहे को चेक नहीं किया.       

इस सहाफी ने अक्टूबर २०१७ में गुजरात इंतेखाबात से क़ब्ल वाज़े अलफ़ाज़ में ये बात कही है की मोदी सरकार अपनी गिरती हुई साख और ज़लालत से बचने के लिए २००२ जैसा हमला करवा सकती है,  लेकिन इस बार हमले की ज़िम्मेदारी पाकिस्तान पे डाल दी जायेगी.   देखिये मज़मून फिर हो सकता है गुजरात में २००२ जैसा हमला जिसकी तस्दीक दो साल बाद अमेरिकन सिक्योरिटी एजेंसी एन.आई.ऐ. ने भी जनवरी २०१९ में कर दी के मोदी हुकूमत राये शुमारी को मुत्तासिर करने और इंतेखाबात जीतने के लिए शदीद हिन्दू मुस्लिम दंगे करवा सकती है.

फरवरी २०१९ में एक मज़मून मुसलमान हिन्दू दहशतगर्दों की इमदाद के मोहताज नहीं.... में इस सहाफी ने कुछ ८ नुक़्तों पे मोदी हुकूमत को फ़ैल क़रार दिया है और उसके लिए इंतेखाबात में कोई भी सुरते हाल नहीं है जिसकी वजह से वो हिन्दू शिद्दत पंसदों की राये शुमारी की यकजेहदी हासिल कर सके.  उन नुक़्तों में ८वे नंबर पे है पाकिस्तान / कश्मीर

चलिए इस हमले के बाद आपके साथ पूरा मुख़ालेफ़ीन आ गया लेकिन आप तो उस सानेहा के ऊपर अपनी सियासी दूकान दारी चालू कर रहे हो.  हर सियासी रैली में उस हमले का बखान करने और बदला लेने के सख्त अज़्म को बार बार दोहराने की किया वजह है. एक बार बोल दिया काफी है.  उसकी सिर्फ दो वजह हो सकती है या तो आप को ये यकीन नहीं है के मुल्क का अवाम अब आपकी फेक्कम बाज़ी पे यकीन करेगा या आप उस हमले का सयासी नफा देख रहे हो.  इस मसले पे आज तक पे इस सहाफी ने एक ट्वीट किया है 

Zuber Ahmed Khan shared a post.
22 hrs
मोदी जी हो गया ना आपने अपने सभी भाषणों में प्रण ले लिया ना की गुनहगारों को सजा ज़रूर मिलेगी. अब उसका राजनीतिकरण काहे को कर रहे हो. एक बार आधिकारिक स्टेटमेंट जारी कर दीजिये बस हो गई बात खत्म. फिर करने दीजिये अधिकारियों और सेना को अपना काम. जब काम हो जाएगा तब सभी को पता चल जाएगा. अब ऐसी बाते अपनी राजनैतिक रैली में करने का क्या मतलब है. मतलब आप सेना के जवानों की मौत पे राजनीति कर रहें हैं. आधिकारिक स्टेटमेंट और सरकारी आदेश जारी कर दिया तब भी देश की जनता को पता चल जाता है उसको चुनावी सभाओं में ढिंढोरा पीटने की ज़रुरत ही नहीं है. आज कल तो सोशल मीडिया का ज़माना है सब बातें और चीज़े तुरत जनता के सामने हाज़िर हो जाती हैं.

दूसरी बात आपकी मीडिया ने मुल्क का माहौल इतना गर्म कर दिया जिससे मुल्क के हर बाशिंदे को दहशत महसूस होने लगी.   दीगर हिस्सों में रह रहे कश्मीरी तुलबा अपने आपको एक मुजरिम जैसा महसूस करने लगे.  मुल्क के दीगर हिस्सों से कश्मीरी तुलबा के ऊपर तशद्दुत और जब्र की ख़बरें आने लगी.  क्या ये ही आपकी और आपके मीडिया की हिकमते अमली थी.  अगर फ़ौजिओं पे पकिस्तान ने हमला किया तो उसको ऐसा करने की हिदायत कहाँ से मिली क्योंकि आप चौकन्ने नहीं थे आप तो अपना सियासी नफा देखने में मुल्क की दीगर एजेंसिओं को इसकी जासुसी उसकी जासूसी करने में इस्तेमाल कर रहे थे तो उसका जो काम है मुल्क के वसाईलों के तहफूज़ के लिए वक़्त किधर मिलेगा.   

इस बात का ज़िक्र ये सहाफी अपने कई मज़मूनों में कर चूका है जब आप अपने हम वतनों की हक़ तल्फी करते हो और वतन का हर अवाम फ़िरक़ों और खित्तों में बटा होता है जब आप अपने मसाइल इतने पेचीदा कर देते हो की उसी में उलझ जाते हो तो दुश्मन को पूरी आज़ादी और इख़्तेयार होता है के आपके मुल्क में घुस कर ना सिर्फ हमला कर दे ब्लकि अपने मक़सद में कामयाब भी रहे.    लेकिन अब मसला वही है के आप तो ठहरे ताक़त के नशे में चूर जो इस सहाफी के पोलिटिकल पंडित की रिपोर्ट और जानकारी का मखौल उड़ाना जानते हो, तो उसकी जानकारी पे अम्ल करना दूर की बात है.    

दिल्ली हो या झारखंड, मध्य प्रदेश हो राजिस्थान हो हरयाणा हो या गुजरात महाराष्ट्र हो या कर्नाटका हर कुदरती बलियात और आफ़ात के बाद इस सहाफी ने ट्वीट कर के कभी पहले तो कभी बाद आगे के हालात से आगाही की है की ना इंसाफ़ी मत करो. यहाँ तक की दिसम्बर २०१८ में सुप्रीम कोर्ट ने सड़क हादसात पे तशवीश ज़ाहिर की है और मर्कज़ से वाज़े अलफ़ाज़ में कहा है की इतने लोग तो दहशतगर्दाना हमलों में नहीं मारे गए होंगे जितनी के आपकी सरकार आने के बाद हादसात का शिकार हो कर मारे गए.  ट्वीट कर के या मजमूनों के ज़रिये आगे के हालात बयान कर देना वो भी इस सहाफी की ६टी सेंस ही थी अब इन ट्वीट के बाद तो आपको और चौकन्ना होना चाहिए था.  फिर ये हमला पाकिस्तान ने कैसे कर दिया मतलब सिक्योरिटी में ज़बरदस्त चूक है.    

दूसरी बात एक मुसन्निफ़ की सोच मुल्क के हालत पे मुनासिर होती हैं और ख्यालात मुल्क में होने वाले हर रोज़ की ज्यात्ति, मार काट, दहशतगर्दी, ना इंसाफ़ी, ज़िना बिल जब्र के ऊपर पैदा होतें हैं और मज़मूनों की खत वैसी ही होती है.  अगर मुल्क के हालात साज़गार होंगे हर तरफ खुशहाली होगी, ठंडी हवाएं बह रही होंगी पुर सुकून माहोल होगा तो मुसन्निफ़ की सोच भी वैसा ही काम करेगी और मज़मून भी बजाये नुक्ताचीनी के नफीस और दिल को सुकून पहुंचाने वाले खुशदिल होंगें.

बस बस टूट गया

"नाव कागज़ की सदा चलती नहीं, ज़ुल्म की टहनी कभी फलती नहीं" पका हुआ एक नासूर हुआ अलग, मज़ीद दो नासूर परेशान करने को तय्यार नाज़...